लखीमपुर और गोला डिपो के बस कंडेक्टरों और ड्राइवरों की मनमानी, दिव्यांगों को देखकर भी नहीं रुकते

वेबवार्ता(न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार वर्मा
लखनऊ 11 दिसम्बर। उत्तर प्रदेश में लखीमपुर और गोला डिपो पहले एमएसटी धारकों से दुव्र्यवहार के लिए कुख्यात था अब अधिकारियों की सरपरस्ती और झगडालू प्रवत्ति के बस ड्राइवरों और कंडेक्टरों के लिए और भी कुख्यात होता जा रहा है। दिन ब दिन पास धारकों और दिव्यांगों की प्रताडना करना इनके लिए प्रिय षगल बनता जा रहा है।
     उल्लेखनीय है कि सीतापुर से लखनऊ रूट पर दिव्यांगों को देखकर बस ड्राइवर और कंडेक्टर बस नहीं रोकते है। अगर एक्का दुक्का बस रूक भी जाए तो दिव्यांग को प्रताडना का षिकार होना पडता है। लखीमपुर और गोला डिपो की करीब 80 प्रतिषत बसें दिव्यांगों को देखकर नहीं रूकती हैं चाहे बस में 10 या 15 लोगों की जगह खाली क्यों न हो। परेषान दिव्यांग एक से दो घंटे बसों को हाथ देता रह जाता है तब जाकर कहीं बस रूकती है।
      इस बारे में सिधौली से लखनऊ जाने वाले दिव्यांग यात्री मनमोहन मिश्र ने बताया कि वह दोपहर 12.30 पर सिधौली के रेलवे स्टेषन के पास से लखनऊ पुरनिया तिराहे के लिए बस से यात्रा करता है वह करीब 1 से दो घंटे बसों को हाथ देता रहता है लेकिन लखीमपुर या गोला बसें उनको देखकर नहींे रोकी जाती हैं। महज एक्का दुक्का बसें रूक जाती हैं जिसके कंडेक्टर या ड्राइवर उनको पहचानते न हों। जब वह पहचान जाते हैं तो रोकना बंद कर देते है। मनमोहन मिश्र बताते हैं कि ऐसा ही लखनऊ से सिधौली वापसी में भी होता है। रात 10 बजे से 12 बजे तक पुरनिया तिराहे पर भी होता है जहां पर पास धारक और दिव्यांग हाथ दिखाते रह जाते हैं लेकिन बसें खाली होने के बाद भी ड्राइवर और कंडेक्टर बस नहीं रोकते है। मनमोहन मिश्र बताते हैं कि अब सिर्फ सीतापुर डिपो की बसें रूक जाती है जिसके न रूकने की षिकायत सीतापुर डिपो के एआरएम विमल राजन से की थी जिसके बाद उनके हस्तक्षेप के बाद बसें रूकने लगी है। लेकिन सिर्फ एक डिपो की बसों का इंतजार करना समय के लिहाज से बेहद मुष्किल होता है। मनमोहन मिश्र ने बताया कि लखीमपुर और गोला की रोडवेज बसों के ड्राइवरों और कंडेक्टरों द्वारा कई माह से किए जा रहे दुव्र्यवहार और बसें न रोकने से परेषान होकर आनलाइन षिकायत मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (जनसुनवाई उत्तर प्रदेश) पर 11 दिसम्बर 2019 को की है जिसकी शिकायत नम्बर 40015419056289 है।
      उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में परिवहन के लिए दिव्यांगों को कई सुविधाएं दी गई हैं। लेकिन उनपर बस के ड्राइवर और कंडेक्टर कितना अमल करते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। दिव्यांगों को देखते ही बस भगा ले जाने, अगर वह बस में बैठ भी जाएं तो हिकारत के साथ मजाक उडाते हुए या दुव्र्यवहार करते हुए पास लगभग छीनते हुए से लेने के मामले सालों से अखबारों और सोषल मीडिया की सुर्खियां बनते रहे है, अगर दिव्यांग संबन्धित डिपो के प्रभारी, आरएम या एआरएम से षिकायत करता है तो वह महज आष्वासन देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं। आरएम, एआरएम, बस ड्राइवर और कंडेक्टर के यह कृत्य दिव्यांग अधिनियम 2016 की धारा 92 और 95 का उल्लंघन है। इसमें सजा और जुर्माने का प्रावधान है। दिव्यांगों को परिवहन की सुविधा पहुंचाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है इसके लिए डिपो के आरएम और एआरएम की भी बनती है। लेकिन जब वह ही नहीं सुनें तो दिव्यांग किससे षिकायत करे। वह सब ओर से परेषान होने के बाद सरकार से मदद ही लेगा। भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतंत्रता, न्याय व गरिमा सुनिश्चित करता है और स्पष्ट रूप से यह विकलांग व्यक्तियों समेत एक संयुक्त समाज बनाने पर जोर डालता है। लेकिन लखीमपुर और गोला डिपो के बस ड्राइवर और कंडेक्टर इसपर अमल क्यों नहीं कर रहे हैं। उनको किसने आदेष दिया है कि दिव्यांगों को उत्तर प्रदेष सरकार द्वारा दी गयी परिवहन सुविधा न उपलब्ध करायी जाए। यह जांच का विशय है।
      उत्तर प्रदेश दिव्यांगजन विभाग की गाइडलाइन में स्पश्ट उल्लेख है कि दिव्यांग द्वारा यात्रा करने पर परिवहन निगम का बस कंडक्टर दिव्यांग को दिव्यांगता प्रमाण-पत्र, दिव्यांगता पास देखने के पश्चात गंतव्य स्थान तक यात्रा की सुविधा उपलब्ध करायेगा। लेकिन बस ड्राइवरों और कंडेक्टरों की मनमानी दिव्यांगों पर भारी पड रही है। अब देखना होगा कि इस दिव्यांग की षिकायत का मुख्यमंत्री कार्यालय या उत्तर प्रदेश दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग क्या आदेष जारी करता है।